Wednesday, April 4, 2018 प्लास्टिक ग्रह: प्लास्टिक के नन्हें कण किस तरह हमारी मिट्टी को प्रदूषित कर रहे हैं

मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को समझने की दिशा में अभी भी काफी शोध की ज़रूरत है।

 

القصص

हाल के समय में दुनिया के महासागरों में तैरते कई मिलियन टन प्लास्टिक ने मीडिया का ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन प्लास्टिक प्रदूषण तथाकथित रूप से पौधों और जानवरों – और साथ ही साथ मनुष्यों के लिए – एक बड़ा खतरा है जो भूमि पर रहते हैं।

हमारे द्वारा हर दिन फेंके जाने वाले प्लास्टिक का बहुत छोटा भाग पुनःचक्रित किया जाता है या कचरे से ऊर्जा बनाने वाली इकाइयों में जलाया जाता है। अधिकांश प्लास्टिक का भूमि में भराव होता है, जहां पर इसे नष्ट होने में 1,000 वर्ष तक लग जाते हैं जिसकी वजह से संभावित रूप से जहरीले पदार्थ भी मिट्टी और पानी में मिल जाते हैं।

जर्मनी के शोधकर्ता चेतावनी दे रहे हैं कि मिट्टी, तलछट और स्वच्छ जल में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी से इन पारिस्थितिक तंत्रों पर लंबे समय के लिए नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उनके मुताबिक, स्थलीय माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण समुद्री माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की तुलना में कहीं ज़्यादा है – तकरीबन चार से 23 गुना तक ज़्यादा जो कि पर्यावरण पर निर्भर करता है।

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बाएं ओर: आर्टिफ़िशियल टर्फ़ फ़ुटबाल फ़ील्ड जिसमें कुशनिंग के लिए ग्राउंड टायर रबर का इस्तेमाल किया गया है। दाएं ओर: उसी फ़ील्ड के माइक्रोप्लास्टिक, वर्षा के साथ बहकर क्रिस्टियानसांड, नॉर्वे की एक धारा में पाए गए।
चित्र सोलइंसिटा द्वारा

भले ही इस क्षेत्र में थोड़ा ही शोध हुआ है पर शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि,अभी तक मिलने वाले परिणाम चिंताजनक हैं: प्लास्टिक के कण लगभग पूरी दुनिया भर में मौजूद हैं और किसी भी हानिकारक प्रभाव का कारण बन सकते हैं।

अध्ययन में मुताबिक प्लास्टिक के कुल कचरे का लगभग एक तिहाई हिस्सा मिट्टी या स्वच्छ जल में पहुंचता है। इसमें से अधिकांश प्लास्टिक टूटकर पांच मिलीमीटर से छोटे कणों में बदल जाता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहते हैं और इनके और टूटने से नैनोपार्टिकल बनते हैं (0.1 माइक्रोमीटर से कम का आकार)। समस्या यह है कि ये कण खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रहे हैं।

 

 

सीवेज (मल)

माइक्रोप्लास्टिक को फैलाने में सीवेज का बहुत योगदान है। अध्ययन के मुताबिक,वास्तविकता यह है कि सीवेज में पाए जाने वाले 80 से 90 प्रतिशत प्लास्टिक के कण जोकि कीचड़ में भी रह जाते गंदे पानी में मौजूद गारमेंट फ़ाइबर के होते हैं। गंदे पानी के कीचड़ का इस्तेमाल अक्सर खेतों में खाद के रूप में किया जाता है जिसका मतलब है कि हर साल हमारी मिट्टी में कई हजार टन माइक्रोप्लास्टिक पहुंचते हैं। माइक्रोप्लास्टिक को नल के पानी में भी पाया जा सकता है।

इसके अलावा, प्लास्टिक के इन छोटे कणों की सतहों पर बीमारी फैलाने वाले जीवाणु भी पाए जा सकते हैं जो पर्यावरण में बीमारियों के वाहक का कार्य कर सकते हैं। माइक्रोप्लास्टिक मिट्टी में रहने वाले जंतुओं के संपर्क में आकर, उनके स्वास्थ्य और मिट्टी के कार्य को प्रभावित कर सकते हैं। “उदाहरण के लिए, मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक होने पर, केंचुए अपने बिल अलग तरीके से बनाते हैं जिससे केंचुओं का स्वास्थ्य और मिट्टी की स्थिति प्रभावित होती है।” यह कहना है साइंस डेली मैगज़ीन में प्रकाशित हुए एक लेख का, जिसमें शोध पर चर्चा की गई है।

विषैले प्रभाव

क्लोरीन युक्त प्लास्टिक अपने आसपास की मिट्टी में हानिकारक रसायन फैला सकता है, जो भूजल में या आसपास के अन्य जल स्रोतों और पारिस्थितिक तंत्र में भी फैल जाते हैं। ऐसा पानी पीने वाली प्रजातियों पर कई संभावित हानिकारक प्रभाव पड़ सकते हैं।

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एक खेत में सीवेज का कीचड़ डालती मशीन

सामान्य तौर पर, जब प्लास्टिक के कण टूटते हैं तो उनमें नए भौतिक और रासायनिक गुण आ जाते हैं जिनसे जीवों पर विषैले प्रभाव पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, प्रभावित प्रजातियों और पारिस्थितिक क्रियाओं की संख्या बढ़ने के साथ विषैले प्रभावों की संभावना भी बढ़ जाती है।

रासायनिक प्रभाव संघटन के चरण में खास तौर पर हानिकारक होते हैं। थैलेट और बिस्फ़ेनॉल ए (सामान्य नाम बीपीए) जैसे एडिटिव प्लास्टिक कणों से निकलते हैं। इन एडिटिव्स को इनके हार्मोन पर पड़ने वाले प्रभावों के लिए जाना जाता है और ये रीढ़दार तथा रीढ़ विहीन दोनों ही प्रकार के जंतुओं के हार्मोन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा नैनो आकार के कण जलन पैदा कर सकते हैं, शरीर के कोशकीय बाधाओं को पार सकते हैं और यहां तक कि बेहद चयनशील झिल्लियों जैसे कि रक्त-मस्तिष्क बाधा या प्लेसेंटा को भी पार कर सकते हैं। कोशिका के भीतर वे जीन की संरचना और जैव-रासायनिक क्रियाओं में बदलाव ला सकते हैं और इसके अलावा भी उनके कई अन्य प्रभाव हो सकते हैं।

इन बदलावों के दीर्घकालिक प्रभावों का अभी इतनी गहराई से पता नहीं लगाया गया है। “हालांकि, यह दिखाया जा चुका है कि रक्त-मस्तिष्क बाधा को पार करते समय, नैनोप्लास्टिक मछलियों के व्यवहार में परिवर्तन लाता है,” यह कहना है लाइबनित्ज़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़्रेशवॉटर इकोलॉजी एंड इनलैंड फ़िशरीज़ का।

माइक्रोप्लास्टिक हमारे पानी में कैसे पहुंचते हैं?

हमारे कपड़े इसका प्रमुख हैं। एक्रिलिक, नायलॉन, स्पैंडेक्स, और पॉलिस्टर जैसे बारीक फ़ाइबर धुलते समय झड़ते हैं और जल उपचार इकाइयों (वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट प्लांट) में पहुंच जाते हैं या खुले पर्यावरण में बहा दिए जाते हैं।

वॉटर वर्ल्ड, ने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि एक वॉशिंग मशीन की प्रत्येक साइकिल के दौरान 700,000 से भी अधिक सूक्ष्म प्लास्टिक फ़ाइबर पर्यावरण में पहुंचते हैं। । हालांकि इससे पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन विकासशील देशों, जहाँ हाथ से कपड़े की धुलाई अधिक प्रचलन में है, में अभी तक नहीं हुआ है लेकिन ये प्रभाव वहां भी काफी व्यापक हो सकते हैं।

कपड़ा कंपनी पैटागोनिया (Patagonia) की तरफ से कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सांता बार्बरा के शोधकर्ताओं द्वारा वर्ष 2016 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि एक सिंथेटिक जैकेट को एक बार धोने पर ही औसतन 1.7 ग्राम माइक्रोफ़ाइबर निकलते हैं।

माइक्रोबीड्स

माइक्रोबीड ठोस प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार आम तौर पर 10 माइक्रोमीटर (0.00039 इंच) से लेकर एक मिलीमीटर (0.039 इंच) तक होता है।

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विभिन्न देशों ने माइक्रोबीड्स-युक्त कॉस्मेटिक और पर्सनल केयर उत्पादों का निर्माण रोकने के लिए कानून बनाए हैं। ऐसे कानून पहले ही कनाडा, आयरलैंड, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम में पारित हो चुके हैं।

खाद्य और कृषि संगठन के रोम स्थित मुख्यालय में 2-4 मई को मृदा प्रदूषण पर एक वैश्विक परिचर्चा आयोजित की जाएगी जिसमें 500 से 700 प्रतिभागियों के भाग लेने का अनुमान लगाया जा रहा है। प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक पर चर्चा “बढ़ती चिंता वाले रसायन” श्रेणी में की जाएगी। ऐसे रसायनों के दूसरे उदाहरण हैं हार्मोन, अंतःस्रावी तंत्र को प्रभावित करने वाले रसायन (एंडोक्राइन डिसरप्टर) और फ़ार्मास्यूटिकल। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण इस परिचर्चा का एक सह-आयोजक है।

#प्लास्टिकप्रदूषणकोहराएं विश्व पर्यावरण दिवस 2018 का विषय है।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: Birguy.Lamizana@un.org

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