Tuesday, May 15, 2018 एक स्वच्छ, सुरक्षित शहर के लिए सफाईकर्मियों का सशक्तीकरण

पश्चिमी भारत के पुणे शहर में, निचले तबके से आने वाली महिलाओं का एक समूह अपने शहर को साफ करने के अभियान का नेतृत्व कर रहा है।

लेख

पश्चिमी भारत के पुणे शहर में, निचले तबके से आने वाली महिलाओं का एक समूह अपने शहर को साफ करने के अभियान का नेतृत्व कर रहा है।

पुणे में भारत का, स्वरोज़गार के रूप में कचरा एकत्रित करने वालों का पहला पूर्ण स्वामित्व वाला कोऑपरेटिव है – जिसे पुणे शहर की अखिल महिला सफाई सेना कहा जा सकता है। पुणे नगर निगम (पु.न.नि.) के साथ हुए एक समझौते के अंतर्गत 3,000 से अधिक महिलाएं घर-घर जाकर लगभग 600,000 घरों से कचरा एकत्रित करती हैं, और प्रतिवर्ष 50,000 टन से अधिक कचरे का पुनःचक्रण करती हैं।

सफाईकर्मी एकत्रित किए गए कचरे को पुनःचक्रित कचरे जैसे पेपर, प्लास्टिक, धातु और कांच या गीले कचरे में छांटते हैं जिसे खाद कंपोस्टिंग के लिए लिया जाया जाता है। “SWaCH” (सॉलिड वेस्ट कलेक्शन एंड हैंडलिंग) के नाम से प्रचलित, कोऑपरेटिव ने कंपोस्टिंग के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रणाली विकसित की है, जिसके द्वारा गीला कचरा मूल्यवान प्राकृतिक खाद में परिवर्तित किया जाता है।

शुरुआत में भराव क्षेत्रों में अपनी जीविका तलाशने वाले लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए स्थापित किया गया यह कोऑपरेटिव अब कचरे से निपटने के एक नए और अधिक सतत मॉडल को भी प्रोत्साहित कर रहा है।

पर्यावरण पर इसके प्रभाव महत्त्वपूर्ण हैं। SWaCH का कहना है कि, एक वर्ष में इसके द्वारा एकत्रित किए गए पेपर के पुनःचक्रण से लगभग 350,000 पेड़ कटने से बच जाते हैं और पर्यावरण में 130,000 मीट्रिक टन के बराबर कार्बन-डाई-ऑक्साइड पहुंचने से रुकती है।

तकनीकी रूप से पुणे में कचरे को छांटना अनिवार्य है, लेकिन सभी घर इसका पालन नहीं करते हैं। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि शहर के कई निवासी अपने कचरे को छांटने में समय नहीं लगाते। इसकी वजह से SWaCH पहल के प्रयास और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

और इसके सामाजिक फायदे भी हैं। लगभग 1.2 मिलियन लोग –अर्थात पुणे की जनसंख्या का लगभग एक तिहाई हिस्सा – शहर की मलिन बस्तियों में रहता है, जहां पर कचरा प्रबंधन सेवाओं की मौजूदगी न के बराबर है। SWaCH भारत की उन शुरूआती पहल में से एक है जो ऐसे पिछड़े क्षेत्रों में घर-घर जाकर कचरा एकत्रित करते हैं।

शुरुआत में भराव क्षेत्रों में अपनी जीविका तलाशने वाले लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए स्थापित किया गया यह कोऑपरेटिव अब कचरे से निपटने के एक नए और अधिक सतत मॉडल को भी प्रोत्साहित कर रहा है।

पर्यावरण पर इसके प्रभाव महत्त्वपूर्ण हैं। SWaCH का कहना है कि, एक वर्ष में इसके द्वारा एकत्रित किए गए पेपर के पुनःचक्रण से लगभग 350,000 पेड़ कटने से बच जाते हैं और पर्यावरण में 130,000 मीट्रिक टन के बराबर कार्बन-डाई-ऑक्साइड पहुंचने से रुकती है।

तकनीकी रूप से पुणे में कचरे को छांटना अनिवार्य है, लेकिन सभी घर इसका पालन नहीं करते हैं। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि शहर के कई निवासी अपने कचरे को छांटने में समय नहीं लगाते। इसकी वजह से SWaCH पहल के प्रयास और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

और इसके सामाजिक फायदे भी हैं। लगभग 1.2 मिलियन लोग –अर्थात पुणे की जनसंख्या का लगभग एक तिहाई हिस्सा – शहर की मलिन बस्तियों में रहता है, जहां पर कचरा प्रबंधन सेवाओं की मौजूदगी न के बराबर है। SWaCH भारत की उन शुरूआती पहल में से एक है जो ऐसे पिछड़े क्षेत्रों में घर-घर जाकर कचरा एकत्रित करते हैं।

SWaCH worker
कागद काच पत्र काश्तकारी पंचायत /SWaCH

रजनी इन बदलावों से काफी खुश हैं; वह पश्चिमी पुणे के कोथरूड इलाके में रहती हैं, जहां पर इन प्रयासों के शानदार परिणाम देखने को मिले हैं: “पहले गटर तरह-तरह के कचरे से जाम हो जाता था”, रजनी, जिनकी उम्र 30 से 40 के बीच है कहती हैं, “जो प्लास्टिक पहले नालों को जाम करता था, अब उसे एकत्रित किया जाता है, जिससे समुदाय को स्वास्थ्य लाभ भी हुए हैं।”

पुणे नगर निगम के डिप्टी कमिश्नर, सुरेश जगताप ने SWaCH के घर-घर जाकर कचरा एकत्रित करने के प्रयासों की सराहना की है: “पुणे शहर में, घर-घर कचरा एकत्रित करने की एक प्रभावी प्रणाली को विकसित करने, तथा इसे अधिक विस्तृत और सतत बनाने हेतु एक अधिक असरकारी कचरा प्रबंधन प्रणाली की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण पहला कदम है। हम सबसे पहले मलिन बस्तियों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और ऐसे 150 स्थानों को हटाने में सफल रहे हैं जहां पर पहले कचरा एकत्रित होता था।”

लेकिन संचालन के इस स्तर को प्राप्त करने की राह आसान नहीं थी। 1993 में, कचरा एकत्रित करने वाले लोग तथा घूम-घूमकर कबाड़ खरीदने वाले लोगों ने मिलकर एक सदस्यता आधारित ट्रेड यूनियन की शुरूआत की। 2005 में, उन्होंने SWaCH के अंतर्गत  गरीबों के अनुकूल एक औपचारिक प्रो-गरीब सार्वजनिक निजी भागीदारी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) सृजित की। इस कोऑपरेटिव का संपूर्ण स्वामित्व इसके सदस्य कर्मचारियों के पास था जो घर-घर जाकर कचरा एकत्रित करते थे।

तबसे लेकर सदस्यों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है। आज के समय में इसके 80 प्रतिशत सदस्य – जो सभी महिलाएं हैं – समाज के हाशिए पर खड़ी जातियों से आती हैं। प्रत्येक सदस्य, संगठन को एक वार्षिक शुल्क अदा करता है तथा उतनी ही राशि अपने जीवन बीमा के लिए देता है। सदस्यों को पहचान पत्र मिलते हैं जिन्हें पुणे नगर निगम का समर्थन मिलता है और जिसके द्वारा वे अन्य लाभ ले सकते हैं, जैसे कि ब्याजमुक्त ऋण और अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सहायता।

SWaCH worker
कागद काच पत्र काश्तकारी पंचायत /SWaCH

SWaCH मॉडल की मज़बूती यह कैंपेन रहा है जिसने कचरा एकत्रित करने वालों को “कर्मचारी” की पहचान दिलाई तथा कचरा एकत्रित करने को एक वैध काम होने की पहचान दिलाई।

भारत में, कचरा एकत्रित करने वालों को समाज के सबसे निचले पायदान पर रखकर देखा जाता है; उनकी भूमिका को शायद ही पहचान या सम्मान दिया जाता है। इसके अलावा कचरा एकत्रित करने की ज़िम्मेदारी प्राइवेट कंपनियों के हवाले करने से उन कचरा एकत्रित करने वालों की आजीविका पर भी खतरा मंडरा रहा था जो अपनी रोज़ी-रोटी अर्जित करने के लिए पुनःचक्रित कचरे (पेपर, धातु, प्लास्टिक, और कांच) को बेचने पर निर्भर थे।

SWaCH ने कचरा एकत्रित करने वालों के प्रति दृष्टिकोण को बदलकर उन्हें स्वरोज़गार में लगे नगर निगम कर्मियों के रूप में पहचान दिलाई है। कचरे को एकत्रित करने, छांटने, विभाजित करने और कभी-कभी साफ करने में लगी उनकी मेहनत की बदौलत एकत्रित सामान ऐसी सामग्री में बदल जाता है जिसे कच्चे पदार्थ के रूप में उत्पादन संबंधी उद्योगों को बेचा जा सकता है। यह कचरा एकत्रित करने वालों को सामग्री आपूर्ति श्रृंखला का अभिन्न अंग –तथा राष्ट्रीय उत्पादकता और आय का मुख्य अंशदाता बना देता है।

पुणे देश की पहली नगर पालिकाओं में से एक था जिसने कचरा एकत्रित करने वालों तथा घूम-घूम कर कबाड़ खरीदने वालों के फ़ोटो पहचान पत्र को मान्यता देकर उन्हें अधिकृत किया था। बदले में यह कार्ड उन्हें सम्मान और पहचान दिलाते हैं।

उनके कार्य को मान्यता देते हुए, शहरी विकास मंत्रालय तथा पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने SWaCH को 2016 में एक आधिकारिक पुरस्कार से  सम्मानित किया।

भारत विश्व पर्यावरण दिवस 2018 की मेज़बानी कर रहा है इस वर्ष का विषय है #करेंगे संग प्लास्टिक प्रदूषण से जंग।

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