Saturday, June 2, 2018 फफूंद से बने फ़ोम से लेकर अनानास से बना चमड़ा: प्लास्टिक के इन 5 विकल्पों पर रखें नज़र

हमारा ग्रह प्लास्टिक कचरे की महामारी से ग्रसित है। शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, 1950 के दशक के आरंभ से लेकर अब तक 8 अरब 30 करोड़ टन से भी अधिक प्लास्टिक का उत्पादन हो चुका है। इसमें से 60 प्रतिशत प्लास्टिक या तो भराव क्षेत्रों या फिर प्राकृतिक पर्यावरण में पहुंच चुका है।

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हमारा ग्रह प्लास्टिक कचरे की महामारी से ग्रसित है। शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, 1950 के दशक के आरंभ से लेकर अब तक 8 अरब 30 करोड़ टन से भी अधिक प्लास्टिक का उत्पादन हो चुका है। इसमें से 60 प्रतिशत प्लास्टिक या तो भराव क्षेत्रों या फिर प्राकृतिक पर्यावरण में पहुंच चुका है।

प्लास्टिक के कुछ व्यावहारिक उपयोगों से इनकार नहीं किया जा सकता है, खासतौर पर चिकित्सकीय उपचार और खाद्य संरक्षण जैसे क्षेत्रों में। समस्या यह है कि प्लास्टिक के कई उपयोग निरर्थक हैं, खास तौर से एक बार उपयोग में आने वाले प्लास्टिक उत्पादों के, जो कई व्यावहारिक और दोबारा उपयोग में आने वाले विकल्पों की जगह ले चुके हैं। चूंकि केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक का ही पुनःचक्रण हो पाया है, इसलिए यह एक गंभीर समस्या है।

फेंका जा चुका अधिकांश प्लास्टिक प्राकृतिक वातावरण में प्रवेश करता है, पारिस्थितिक तंत्र को बाधित करता है और वन्यजीवन को खतरे में डालता है।  जहां एक ओर धातु और कांच जैसे पारंपरिक विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ नए पदार्थ भी बाज़ार में पहुंच चुके हैं जो पर्यावरण के लिए कहीं बेहतर हैं और प्लास्टिक की हमारी आदत को छुड़ाने में मददगार साबित हो सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट प्लास्टिक के उन विविध विकल्पों का विवरण देती है जो पहले ही उभर कर सामने आ चुके हैं। हमने उनमें से कुछ विकल्पों की चर्चा यहां की गई है।

बढ़ती हुई टिकाऊ पैकेजिंग

Mycofoam
माइकोफॉम को कृषि से उत्पन्न कचरे से बनाया जाता है। (विकीमीडिया)

माइकोफ़ोम का विकास इकोवेटिव (Ecovative) कंपनी द्वारा विस्तारित पॉलिस्टीरीन, या ईपीएस के विकल्प के रूप में किया गया था। ईपीएस एक ऐसा पदार्थ है जो खाद्य पदार्थों और बिजली के सामान के परिवहन के दौरान उनकी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पसंदीदा पदार्थ बन चुका है। माइकोफ़ोम को बनाने के लिए कृषि से उत्पन्न कचरे को सांचों में रखा जाता है और जीवित माइसीलियम फफूंद के साथ मिलाया जाता है, जो पदार्थ को विकसित कर इसे इसका पूर्ण आकार प्रदान करता है। इसके बाद इसे सुखाकर स्थाई पैकिंग पदार्थ के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

पारंपरिक ईपीएस की तरह, यह पदार्थ प्रभाव प्रतिरोधी है और इसे ग्राहक की ज़रूरतों के मुताबिक विभिन्न आकारों में बनाया जा सकता है। इन खूबियों के अलावा यह बायोडिग्रेडेबल होता है और स्वाभाविक रूप से पुनः उत्पन्न होने वाले संसाधनों से निर्मित होता है। कंपनियों ने पहले ही ईपीएस की जगह पर इसका उपयोग शुरू कर दिया है। डेल इन्हीं कंपनियों में से एक है, जिसने माइकोफ़ोम का उपयोग कर अपनी उत्पादन श्रृंखला को 94 प्रतिशत कचरामुक्त बना लिया है।

दूध से वस्त्र निर्माण

Fibres made from milk

हनोवर में फ़ैशन डिज़ाइनर और माइक्रोबायोलॉजिस्ट आन्के डोमास्क के स्टूडियो में दूध के रेशम और दूध के एक जग की तस्वीरें लगी हुई हैं। डोमास्क अपने फ़ैशन के लिए दूध के धागे का उपयोग करती हैं जो दूध के प्रोटीन रेशम से बनता है, जिसे उस दूध से निकाला जाता है जो स्वच्छता के मानकों को पूरा नहीं करता है। डोमास्क ने बताया कि दूध के रेशम में 18 अमीनो अम्ल होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते है। एक ड्रेस को तैयार करने के लिए उन्हें छह लीटर दूध की आवश्यकता पड़ती है। रायटर्स/फैबियन बिमर

सुनने में यह बात भले ही अजीब लगे, लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत के समय से ही दूध का इस्तेमाल प्लास्टिक बनाने के लिए होता आया है। दूध में पाए जाने वाले कैसीन प्रोटीन को एक गहन रासायनिक प्रक्रिया का उपयोग करते हुए, शुरुआती प्लास्टिक निर्माता बटन और सिंथेटिक वस्त्र बनाया करते थे। हालांकि 20वीं सदी में प्लास्टिक के नए पेट्रोलियम आधारित रूपों के अस्तित्व में आने के बाद, प्लास्टिक निर्माण में दूध का उपयोग एक दम से घट गया।

2011 से लेकर, जर्मन उद्यमी आन्के डोमास्क और उनकी कंपनी क्यूमिल्च(QMilch) इस तकनीक के बदले हुए स्वरूप का इस्तेमाल कर उस दूध से टिकाऊ कपड़े का रेशम बना रहे हैं, जो अन्यथा बर्बाद हो जाता। डोमास्क ने कैसीन प्लास्टिक को बनाने की पुरानी प्रक्रिया को आसान बनाया और एक ऐसी विधि की खोज की, जो काफी कम मात्रा में रसायनों का इस्तेमाल करती है और विविध उपयोग वाले टिकाऊ बायोपॉलीमर बनाती है। इनका इस्तेमाल खासतौर पर कपड़ा उद्योग में होता है। और क्योंकी उनकी कंपनी दूध को उन उत्पादकों से प्राप्त करती है जो इसे फेंकने वाले होते हैं, इसलिए संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला से पर्यावरण को लाभ पहुंचता है।

अनानास के फ़ाइबर से बने चमड़े का एक विकल्प

Pinatex
पिनाटेक्स (Piñatex) "अनानास के चमड़े" जो फेंके जा चुके अनानास के पत्तों से बनता है। (विकीमीडिया)

चमड़ा भले ही बहुउपयोगी हो, लेकिन हर कोई चमड़ा नहीं पहन सकता है। इसकी वजहें नैतिक, पर्यावरणीय, या आर्थिक हो सकती हैं। एक सस्ते विकल्प के रूप में कृत्रिम चमड़े का उत्पादन काफी समय से होता आया है, लेकिन कपड़े और प्लास्टिक का इस्तेमाल कर इसे बनाने की विधि सतत नहीं है। लंदन में स्थित कंपनी अनानास एनम (Ananas Anam) द्वारा बनाया जाने वाला पिनाटेक्स, अनानास के पत्तों से बनाया जाने वाला पर्यावरण के अनुकूल और एक टिकाऊ विकल्प है।

क्योंकि किसी अतिरिक्त संसाधन की ज़रूरत नहीं होती है और अनानास की खेती में ढेर सारे पत्ते निकलते हैं, इसलिए संपूर्ण प्रक्रिया एक सतत, चक्रीय आपूर्ति श्रृंखला में फ़िट बैठती है और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का ज़रिया बनती है। कटाई के बाद, फिलीपीन्स के कृषि समुदाय छोड़े जा चुके पत्तों को एकत्रित कर उनसे फ़ाइबर निकालते हैं। इसके बाद इन फ़ाइबर से जाल बनाकर इन्हें अंतिम रूप देने के लिए स्पेन की एक फ़ैक्टरी में भेज दिया जाता है। अंतिम उत्पाद को फिर सीधे डिज़ाइनरों और उत्पादकों को भेज दिया जाता है, जो पहले से ही जूतों, बैग और फ़र्निशिंग के उत्पादन में पिनाटेक्स का उपयोग कर रहे हैं।

 

खाने योग्य छुरी-चम्मचें

Edible spoons
प्लास्टिक से बने तथा उपयोग के बाद फेंक दिए जाने वाले छुरी-चम्मचों की जगह लेने के लिए एक भारतीय कंपनी ऐसी छुरी-चम्मचें बना रही है, जिन्हें खाया जा सकता है (बेकीस)।

हमारे द्वारा एक ही बार उपयोग किए जाने वाले उत्पादों की खपत कम करने की रणनीति प्लास्टिक के कचरे को पर्यावरण में पहुंचने से रोकने की दिशा में काफी महत्त्वपूर्ण है। यह बात रेस्टोरेंट उद्योग पर खास तौर पर लागू होती है है, जिसने हाल के वर्षों में प्लास्टिक से बने प्लेट, स्ट्रॉ और छुरी-चम्मचों के उपयोग में भारी बढ़ोत्तरी देखी है।

ऐसे में बेकीस (Bakeys) का प्रवेश हुआ, जिसकी स्थापना 2010 में नारायण पीसापति द्वारा की गई। इस भारतीय कंपनी ने प्लास्टिक के बर्तनों का एक सरल परंतु अभूतपूर्व विकल्प विकसित किया है। कंपनी द्वारा विकसित किए गए चम्मचों को खाया जा सकता है। इसकी वजह है कि ये चम्मच ज्वार के आटे से बनते हैं, जो दक्षिण एशिया, अफ्रीका और मध्य अमेरिका में सामान्य तौर पर उगाई जाने वाली एक ऊर्जादक्ष और लोचदार फसल है। चम्मच टिकाऊ हैं, खाने में आसान हैं तथा तीन स्वादों में आते हैं: सादा, मीठा और चटपटा। वर्तमान में ये केवल भारत में उपलब्ध हैं, लेकिन कंपनी उत्पादन को बढ़ाने और प्लास्टिक के छुरी-चम्मचों से प्रतिस्पर्धा करने पर विचार कर रही है।

 

पत्तों से बनने वाले प्लेट और कटोरे

Biodegradable dishware

ताड़ के पत्तों से बने प्राकृतिक रूप से नष्ट होने वाले (बायोडिग्रेडेबल) बर्तनों का एक उदाहरण (पिक्साबे)।

पौधों के पत्तों का प्लेट के रूप में उपयोग होने का दुनिया भर के समुदायों में काफी पुराना इतिहास रहा है। मानव इतिहास के अधिकांश हिस्से में खाने का यह तरीका कारगर रहा, लेकिन अब बाज़ार में प्लास्टिक से बनी और एक बार उपयोग होने वाली प्लेटें और कटोरे अपने पांव जमा चुके हैं, जिन्हें कभी आसपास के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके बनाया जाता था। इस प्रचलन का मुकाबला करने के लिए कुछ कंपनियां पुरानी तकनीक का उपयोग कर नए प्रकार के डिस्पोज़ेबल प्लेट और कटोरे बना रही हैं जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

लीफ़ रिपब्लिक (Leaf Republic) एक ऐसी ही कंपनी है। यह जर्मनी स्थित एक स्टार्ट-अप है, जो पारंपरिक भारतीय पत्रावली थालियों की विधि से बनी खाने की पैकेजिंग बेचती है। रेस्टोरेंट में आमतौर पर मिलने वाली डिब्बाबंद प्लास्टिक पैकेजिंग की जगह लेने वाले इन प्लेटों और कंटेनरों को बनाने के लिए पत्तों को एक साथ सिला जाता है, दबाया जाता है और फिर सुखाया जाता है।

लिटिल चेरी (Little Cherry) एक अन्य कंपनी है जो प्लास्टिक के एक टिकाऊ परंतु लाभदायक विकल्प को बढ़ावा दे रही है। यूके स्थित यह कंपनी सुपारी के पत्तों से बनी पार्टी सामग्री बेचती है। ये पत्ते भारत में सुपारी के उत्पादन के दौरान छोड़ दिए जाते हैं। भले ही उपयोग किए गए पदार्थ अलग-अलग हों, परंतु दोनों ही इसका उदाहरण हैं कि किस तरह से पारंपरिक पदार्थों का 21वीं सदी में सतत ढंग से उपयोग पुनः शुरू किया जा सकता है।

#करेंगे संग प्लास्टिक प्रदूषण से जंग  विश्व पर्यावरण दिवस 2018 का विषय है।

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